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Sunday, December 1, 2013

गजल गीता (Gazal Gita)



गजल गीता

प्रथमहिं गुरुको शीश नवाऊँ | हरिचरणों में ध्यान लगाऊँ ||१||
गजल सुनाऊँ अद्भुत यार | धारण से हो बेड़ा पार ||२||
अर्जुन कहै सुनो भगवाना | अपने रूप बताये नाना ||३||
उनका मैं कछु भेद न जाना | किरपा कर फिर कहो सुजाना ||४||
जो कोई तुमको नित ध्यावे | भक्तिभाव से चित्त लगावे ||५||
रात दिवस तुमरे गुण गावे | तुमसे दूजा मन नहीं भावे ||६||
तुमरा नाम जपे दिन रात | और करे नहीं दूजी बात ||७||
दूजा निराकार को ध्यावे | अक्षर अलख अनादि बतावे ||८||
दोनों ध्यान लगाने वाला | उनमें कुण उत्तम नन्दलाला ||९||
अर्जुन से बोले भगवान् | सुन प्यारे कछु देकर ध्यान ||१०||
मेरा नाम जपै जपवावे | नेत्रों में प्रेमाश्रु छावे ||११||
मुझ बिनु और कछु नहीं चावे | रात दिवस मेरा गुण गावे ||१२||
सुनकर मेरा नामोच्चार | उठै रोम तन बारम्बार ||१३||
जिनका क्षण टूटै नहिं तार | उनकी श्रद्घा अटल अपार ||१४||
मुझ में जुड़कर ध्यान लगावे | ध्यान समय विह्वल हो जावे ||१५||
कंठ रुके बोला नहिं जावे | मन बुधि मेरे माँही समावे ||१६||
लज्जा भय रु बिसारे मान | अपना रहे ना तन का ज्ञान ||१७||
ऐसे जो मन ध्यान लगावे | सो योगिन में श्रेष्ठ कहावे ||१८||
जो कोई ध्यावे निर्गुण रूप | पूर्ण ब्रह्म अरु अचल अनूप ||१९||
निराकार सब वेद बतावे | मन बुद्धी जहँ थाह न पावे ||२०||
जिसका कबहुँ न होवे नाश | ब्यापक सबमें ज्यों आकाश ||२१||
अटल अनादि आनन्दघन | जाने बिरला जोगीजन ||२२||
ऐसा करे निरन्तर ध्यान | सबको समझे एक समान ||२३||
मन इन्द्रिय अपने वश राखे | विषयन के सुख कबहुँ न चाखे ||२४||
सब जीवों के हित में रत | ऐसा उनका सच्चा मत ||२५||
वह भी मेरे ही को पाते | निश्चय परमा गति को जाते ||२६||
फल दोनों का एक समान | किन्तु कठिन है निर्गुण ध्यान ||२७||
जबतक है मन में अभिमान | तबतक होना मुश्किल ज्ञान ||२८||
जिनका है निर्गुण में प्रेम | उनका दुर्घट साधन नेम ||२९||
मन टिकने को नहीं अधार | इससे साधन कठिन अपार ||३०||
सगुन ब्रह्म का सुगम उपाय | सो मैं तुझको दिया बताय ||३१||
यज्ञ दानादि कर्म अपारा | मेरे अर्पण कर कर सारा ||३२||
अटल लगावे मेरा ध्यान | समझे मुझको प्राण समान ||३३||
सब दुनिया से तोड़े प्रीत | मुझको समझे अपना मीत ||३४||
प्रेम मग्न हो अति अपार | समझे यह संसार असार ||३५||
जिसका मन नित मुझमें यार | उनसे करता मैं अति प्यार ||३६||
केवट बनकर नाव चलाऊँ | भव सागर के पार लगाऊँ ||३७||
यह है सबसे उत्तम ज्ञान | इससे तू कर मेरा ध्यान ||३८||
फिर होवेगा मोहिं सामान | यह कहना मम सच्चा जान ||३९||
जो चाले इसके अनुसार | वह भी हो भवसागर पार ||४०||